समूह से जुड़कर संजू मालवीय के जीवन में आया बदलाव संजू मालवीय अन्य महिलाओं के लिए बनी प्रेरणा स्रोत

समूह से जुड़कर संजू मालवीय के जीवन में आया बदलाव संजू मालवीय अन्य महिलाओं के लिए बनी स्त्रोत
 राधेश्याम देवड़ा की रिपोर्ट शाजापुर, 13 दिसम्बर 2024/

 शासन की मंशा है कि प्रदेश के हर एक बेरोजगार को रोजगार मिले। इसके साथ ही प्रदेश की महिलाओं एवं बेटियों को भी स्व रोजगार प्राप्त हो सके और वे लखपति बनें, इसके लिए शासन द्वारा विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही है। शासन द्वारा संचालित म.प्र. डे राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के स्व सहायता समूह से महिलाएं जुड़कर आर्थिक रूप से सक्षम हो रही है और समाज में अपनी पहचान बना रही है। ऐसी ही स्वसहायता समूह से जुड़ी शाजापुर जिले की जनपद पंचायत मो. बड़ोदिया की ग्राम पंचायत गोविन्दा की निवासी 32 वर्षीय श्रीमती संजू मालवीय के जीवन में आर्थिक और सामाजिक बदलाव आया है। वह समूह से जुड़कर आज अच्छी आय अर्जित कर रही है और अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन गई है। श्रीमती मालवीय बताती हैं कि वर्तमान समय में समाज में विद्यमान वर्जनाएं महिलाओं को विकास में बाधक हैं जैसे कि समाज में प्रचलित है कि औरत क्या काम करेगी, औरत सिर्फ घर और बच्चे संभाल सकती हैं। ऐसे में उनका घर से बाहर निकलना भी मुश्किल था। जहां भी जाना होता था, अपने पति या घर के सदस्य के साथ ही जाना होता था। श्रीमती संजू मालवीय ने बताया कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ख़राब होने के कारण उन्हें मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करना पड़ता था। साथ में उनके पति भी मजदूरी का ही कार्य करते थे, जिससे उनकी दैनिक आय 250 से 300 रुपए होती थी, जो घर चलाने के अनुरूप नहीं थी। श्रीमती मालवीय बताती है कि उनके गांव में सीआरपी ड्राइव के अन्‍तर्गत वर्ष 2015 में आगर जिले से समूह की दीदीयां उनके गांव में आयी थी और वे 8 दिनों तक रूक कर गांव का सर्वे कर गांव की सभी महिलाओं को समूह से जुड़कर कैसे परिवार को आगे बढ़ा सकते है, अपनी आय को कैसे बढ़ा सकतें हैं के बारे में बताया और समझाया, तब उन्होंने पूरे 8 दिन तक सीआरपी दीदीयों का सहयोग किया उसे समूह से जुड़ने का महत्‍व पता चला। सारी बाधाओं से पार पाते हुए श्रीमती मालवीय ने अपने मोहल्‍ले से 12 दीदीयों को साथ में लेकर “जय माता दी आजीविका स्वसहायता समूह का गठन किया। चूंकि वे 9 वी कक्षा तक पढ़ी थी, इसके कारण उसे सभी 11 दीदीयों ने आपसी सहमति से सचिव के रूप में चुना। समूह में जुड़ने के बाद अपने जीवन में आए बदलाव के बारे में वे कहती हैं कि समूह से जुड़कर सबसे पहले उन्होंने 10 रूपये से बचत शुरू की और उस बचत से उन्होंने अपनी रोज की घर की आवश्‍यकता की पूर्ति के लिए समूह से ऋण लेना शूरू करा, इसके पश्‍चात लगातार समूह की बैठके करने से समूह को आजीविका मिशन से आर.एफ. के रूप में 12000 रूपये प्राप्‍त हुए और उन्होंने अपनी आवश्‍यकता की पूर्ति के लिए ऋण लिये। उन्होंने बताया कि छ: माह बाद हम ग्राम संगठन से जुड़े और हमारा समूह अच्‍छा होने के कारण हमने ग्राम संगठन से हमारे समूह ने 75000 सीआईएफ राशि ऋण के रूप में अपने पति और परिवार की सहमति से 22000 रुपए ऋण के रूप में लिए और एक छोटी किराना दुकान शुरू की, जिससे उन्हें 4 से 5 हजार रूपये मासिक आय होने लगी। उन्होंने बताया कि माईके में रहते हुए 09 वी कक्षा तक पढ़ाई की और उनकी शादी हो गई थी। शैक्षणिक स्तर बढ़ाने को लेकर उसके मन में लगातार इच्छाएं प्रबल थी, जिसे देखते हुए उसके पति ने उसे आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया और अब वह बीए पास हो गई है। उन्होंने बताया कि उनकी शिक्षा को देख कर आजीविका मिशन के अधिकारियों ने उन्हें बैंक सखी के रूप में चयनित किया और पांच दिन का प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण प्राप्‍त करने पर उन्हें मध्‍यप्रदेश ग्रामीण बैंक में बैठने का अवसर मिला। वहां वे गांव के साथ आस-पास के 10 से 15 गांवों के समूहों के बैंक लेन-देन, समूह के खाते खुलवाना, समूह से जुडे़ सभी सदस्‍यों के बीमे करवाना और किसी की अचानक दुर्घटना व मृत्‍यु होती हैं तो उनको बीमे की राशि दिलवाना जैसे काम करते हुए उन्हें आजीविका मिशन से 3 हजार रूपये प्रतिमाह मानदेय मिलता हैं। इसी के साथ संकुल से जुड़ने से ग्रामीण आजीविका एक्‍सप्रेस योजना से उनके संकुल को वाहन मिला, जिसमें उनके पति को संकुल संगठन द्वारा ड्राईवर के रूप में चुना गया, जिससे उनके पति को प्रतिमाह 7000 रूपये की आय प्राप्‍त होती हैं। धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए उनके समूह को पीडीएस शॉप मिली, जिसमें उसे सेल्समैन के रूप चुना गया, जिससे उन्हें 8000 रूपये मासिक आय होती हैं। आज की स्थिति में वे अपने काम उनके पति की आय को मिलाकर 22000 से 23000 रूपये लगभग मासिक आय प्राप्त कर रहे हैं। समूह से जुडने के बाद अपने जीवन में आए बदलाव के बारे में वे कहती हैं कि परिवार और समाज में उसका मान-सम्मान बढ़ा है, पहले जो लोग समाज का हवाला देकर घर से निकलने नहीं देते थे, आज वे उन्हें देखकर कहते हैं की अपनी बहु को भी संजू के जैसा बनाना है। क्रमांक 85/1994/चंदेलकर

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